इतिहास समेटे है खाना पट्टी की रामलीला

जौनपुर। सिकरारा क्षेत्र के खानापट्टी की रामलीला आज भी अपनी विशिष्टता बनाए हुए है।   इस ऐतिहासिक रामलीला की शुरुआत लगभग आठ दशक पूर्व काशी नरेश ने कराई थी, जो अब तक अनवरत जारी है। तकनीक के जमाने में भी उसी सनातन परंपरा का रूप लिए यहां की रामलीला आज भी जिदा है। यहां आधुनिकता को रंगमंच पर रंचमात्र भी प्रवेश की अनुमति नहीं मिल सकी है। रामलीला की दीवानगी पात्रों के चयन के समय से ही बढ़ जाती है। रामलीला के कुछ ऐसे भी कलाकार हैं जो नौकरी करने के लिए मुंबई, दिल्ली, गुजरात, हैदराबाद, पूना आदि शहरों में रहते हैं। जो अवकाश लेकर रामलीला का मंचन करने आ जाते हैं। राम का अभिनय करने वाले सुनील सिंह मुंबई में एक टेलीकॉम कंपनी में काम करते हैं तो वहीं रावण बनने वाले सत्यानंद सिंह मुंबई में भवन बनाने वाली एक निजी कंपनी में कार्यरत हैं। राम के सखा व गंधी का अभिनय करने वाले अश्वनी सिंह पूना के एक निजी कंपनी में कार्यरत हैं। खरदूषण व रावण का सेनापति बनने वाले अवनीश सिंह टोनी पूना में ग्लास कंपनी में मैनेजर के पद पर हैं। सीता की सखी, तारा, सुलोचना का अभिनय करने के लिए दिल्ली से सूरज सिंह आते हैं। सूरज बीटेक के छात्र हैं। यह सभी पात्र पितृपक्ष की समाप्ति तक गांव पहुंच जाते हैं। इतिहास गवाह परंपराओं का आजादी के पहले से सिकरारा बाजार के समीप ताहिरपुर गांव में राजा बनारस की छावनी थी। स्थानीय लोगों के कहने पर काशी नरेश ने खर्च देकर अपनी देखरेख में रामलीला का मंचन शुरू कराया। आजादी के बाद जमींदारी प्रथा समाप्त होने पर खानापट्टी गांव निवासी बृजमोहन सिंह व उनके बड़े भाई राम लखन सिंह, ताहिरपुर से रमेश सिंह, भरतपुर से राज बहादुर सिंह, इटहवां गांव से तिलकधारी सिंह के साथ बाजार निवासी राम प्रसाद गुप्ता व मदन सेठ की देख-रेख में उसी स्थान पर मंचन कार्य जारी रखा।

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