संचार क्रांति ने खामोश कर दिया डाकिया डाक लाया की आवाज
https://www.shirazehind.com/2018/12/blog-post_635.html
जौनपुर। डाकिया डाक लाया , ख़ुशी का पयाम कहीं दर्दनाक लाया
डाकिया डाक लाया ...
इन्दर के भतीजे की साली की सगाई है
ओ आती पूरणमासी को क़रार पाई है
मामा आपको लेने आते मगर मजबूरी है
बच्चों समेत आना आपको ज़रूरी है
दादा तो अरे रे रे रे दादा तो गुज़र गए, दादी बीमार है
नाना का भी तेरहवां आते सोमवार है
छोटे को प्यार देना बड़ों को नमस्कार
मेरी मजबूरी समझो कारड को तार
शादी का संदेसा तेरा है सोमनाथ लाया
डाकिया डाक लाया ...
यह आवाज किसी जमाने में शहर की गलियों से लेकर गांवो तक गुंजती थी। डाकिया की आवाज सुनते ही घर में, खेत में या अन्य स्थानो पर काम रहे लोग डाकिया के पास दौड़ पड़ते थे इसमें बच्चे सबसे आगे होते थे। घर की महिलाएं खासकर जिसके पति परदेश में होते थे वे खुशी से झूम उठती थी, उन्हे ये आशा होती थी शायद मेरे पति का कोई संदेशा आया हो। लेकिन जब उनकी चिठ्ठी न होने की खबर मिलती थी वे मायूस हो जाया करती थी। डाकिया पोस्ट कार्ड, अंतरदेशी थमाता था लोग खुशी का ठीकाना नही होता था। लेकिन वही जब तार आने की खबर देता था लोग सहम जाया करते थे , घर की महिलाएं रोना शुरू कर देती थी। इस तार को घर का सबसे मजबूत दिल वाला खोलकर पढ़ता था या डाकिया खुद ही पढ़कर बताता था कि आया हुआ तार दुःखभरी खबर लाया है या बेटे की नौकरी का काल लेंटर लेकर आया है। अक्सर ऐसा होता था कि तार में पुत्र की नौकरी का संदेशा है लेकिन इस खुशियों से दूर घर वाले मातम मनाना शुरू कर देते थे लेकिन उन्हे पता चलता था कि यह तार उनके पुत्र को अफसर बनने का संदेशा लेकर आया है तो पल भर में मातम भरा माहौल खुशियों में तब्दील हो जाया करती थी। इसके अलावा परदेश रह रहे लोग पैसा भी डाक विभाग के माध्यम से ही भेजते थे।
संचार क्रांति ने इसे पूरी तरह से दफ्न कर दिया। पहले टेलीफोन, उसके बाद मोबाईल ने इस पर असर डाला लेकिन इंटरनेट और सोशल मीडिया ने इसकी पूरी तरह से कमर ही तोड़ डाली। अब शहर में न ही गांव में डाकिया की आवाज सुनाई नही देती है।
फिलहाल अभी तमाम जगहो पर लेटर बाक्श तो मौजूद है लेकिन आन वाले समय में यह भी इतिहास के पन्नो तक ही सीमित रहे जायेगा।
डाकिया डाक लाया ...
इन्दर के भतीजे की साली की सगाई है
ओ आती पूरणमासी को क़रार पाई है
मामा आपको लेने आते मगर मजबूरी है
बच्चों समेत आना आपको ज़रूरी है
दादा तो अरे रे रे रे दादा तो गुज़र गए, दादी बीमार है
नाना का भी तेरहवां आते सोमवार है
छोटे को प्यार देना बड़ों को नमस्कार
मेरी मजबूरी समझो कारड को तार
शादी का संदेसा तेरा है सोमनाथ लाया
डाकिया डाक लाया ...
यह आवाज किसी जमाने में शहर की गलियों से लेकर गांवो तक गुंजती थी। डाकिया की आवाज सुनते ही घर में, खेत में या अन्य स्थानो पर काम रहे लोग डाकिया के पास दौड़ पड़ते थे इसमें बच्चे सबसे आगे होते थे। घर की महिलाएं खासकर जिसके पति परदेश में होते थे वे खुशी से झूम उठती थी, उन्हे ये आशा होती थी शायद मेरे पति का कोई संदेशा आया हो। लेकिन जब उनकी चिठ्ठी न होने की खबर मिलती थी वे मायूस हो जाया करती थी। डाकिया पोस्ट कार्ड, अंतरदेशी थमाता था लोग खुशी का ठीकाना नही होता था। लेकिन वही जब तार आने की खबर देता था लोग सहम जाया करते थे , घर की महिलाएं रोना शुरू कर देती थी। इस तार को घर का सबसे मजबूत दिल वाला खोलकर पढ़ता था या डाकिया खुद ही पढ़कर बताता था कि आया हुआ तार दुःखभरी खबर लाया है या बेटे की नौकरी का काल लेंटर लेकर आया है। अक्सर ऐसा होता था कि तार में पुत्र की नौकरी का संदेशा है लेकिन इस खुशियों से दूर घर वाले मातम मनाना शुरू कर देते थे लेकिन उन्हे पता चलता था कि यह तार उनके पुत्र को अफसर बनने का संदेशा लेकर आया है तो पल भर में मातम भरा माहौल खुशियों में तब्दील हो जाया करती थी। इसके अलावा परदेश रह रहे लोग पैसा भी डाक विभाग के माध्यम से ही भेजते थे।
संचार क्रांति ने इसे पूरी तरह से दफ्न कर दिया। पहले टेलीफोन, उसके बाद मोबाईल ने इस पर असर डाला लेकिन इंटरनेट और सोशल मीडिया ने इसकी पूरी तरह से कमर ही तोड़ डाली। अब शहर में न ही गांव में डाकिया की आवाज सुनाई नही देती है।
फिलहाल अभी तमाम जगहो पर लेटर बाक्श तो मौजूद है लेकिन आन वाले समय में यह भी इतिहास के पन्नो तक ही सीमित रहे जायेगा।