दुर्लभ जड़ी-बूटियों के संरक्षण का भगीरथ प्रयास
https://www.shirazehind.com/2014/06/blog-post_4869.html
सरपतहां (जौनपुर) : डीह अशर्फाबाद निवासी सुधाकर नाथ सिंह की बगिया में आज जड़ी-बूटियों समेत औषधीय पौधों की 85 प्रजातियां मौजूद हैं। जिनमें लगभग दर्जन भर ऐसी हैं जो विलुप्ती के कगार पर हैं। किसी सरकारी कर्मी की प्रेरणा से पेड़ों की कटाई का धंधा छोड़ उनके संरक्षण का पवित्र संकल्प ले लिया जो अनवरत जारी है।
आज सुधाकर सिंह के पास अकरकरा, सतावर, अश्वगंधा, सर्पगंधा, नागरमोथा, कौंच, विधारा, काली हल्दी, गुड़मार, स्टीविया, रतनजोत, सफेद मूसली, बड़ी कटेरी, लाजवंती, कालमेघ, धतूरा (काला, पीला, सफेद) समेत लगभग विलुप्त हो चुकी लक्ष्मणा, वच, कलिहारी, वुन हल्दी आदि प्रमुख हैं।
श्री सिंह के अनुसार 1998 के पूर्व उनके पास आरा मशीन थी तथा पेड़ों की कटाई ही उनका व्यवसाय था। वन विभाग के एक रेंजर ने उन्हें वृक्षारोपण के प्रति प्रेरित किया। आज उनके साथ देश-विदेश के लगभग 500 किसान जुड़े हैं। जिनमें नेपाल के यज्ञनिधि कोइराला, नागालैंड के निहाली चोपड़ी, कनाडा के सीबी सिंह तथा अमेरिका के किसान प्रमुख हैं।
श्री सिंह ज्यादातर पौधों को अपनी ही नर्सरी में तैयार करते हैं। औषधीय प्रजातियों के बीजों का उत्पादन अपने साथ जुड़े किसानों को प्रशिक्षण तथा सामाजिक जानकारियां उपलब्ध कराना इनकी दिनचर्या में शामिल है। सीखने की ललक के चलते वर्ष 2001 में वे सीमैप से भी जुड़े। सालाना आयोजित किसान गोष्ठी मेले में शिरकत भी करते हैं। बाजार विस्तारक के रूप में वाराणसी में संभावित भी किए जा चुके हैं।
उन्होंने बताया कि सीमैप से जुड़ने के बाद उनके साथ तमाम देशी-विदेशी किसान जुड़े। हालांकि इस प्रयास में आज तक उन्हें कोई सरकारी सहायता नहीं मिली। उनके इस प्रयास में स्नातकोत्तर शिक्षा प्राप्त पुत्री नीलम सिंह तथा दो मित्र झारखंडे तिवारी व विनोद पांडेय सक्रिय सहयोग देते हैं। इनके द्वारा तैयार पौधे यूपी सहित मध्य प्रदेश, झारखंड, राजस्थान आदि प्रांतों में आपूर्ति किए जाते हैं।
बहरहाल आज इस मॉडल किसान को सिर्फ इस बात का मलाल है कि लोग अपनी इस जीवनदायिनी परंपरा से विमुख होते जा रहे हैं। इनके संरक्षण के प्रति न सरकारें गंभीर हैं और न आम जनता।